श्रावण मास में दिनचर्या और जीवनशैली बहुत जरूरी– डॉ. अवनीश उपाध्याय

हरिद्वार 

‎श्रावण मास, भारतीय पंचांग के अनुसार वर्षा ऋतु का एक प्रमुख महीना है, जिसे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऋतु-परिवर्तन के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। आयुर्वेद शास्त्र में इसे ‘दोष विकृति काल’ कहा गया है, क्योंकि इस समय वात, पित्त और कफ – तीनों दोष असंतुलन की स्थिति में आ जाते हैं। ऋषि चरक और सुश्रुत ने इस ऋतु में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।

‎ऋतुचर्या: क्या कहती है आयुर्वेद की ऋतु नीति?
‎वर्षा ऋतु में अग्नि (पाचन शक्ति) मंद पड़ जाती है। चरक संहिता के अनुसार, “वर्षासु वातः प्रवर्धते” अर्थात वर्षा में वात दोष बढ़ता है। अतः इस समय खान-पान और जीवनचर्या में विशेष अनुशासन की आवश्यकता होती है।

‎वरिष्ठ आयुर्वेद शोध विशेषज्ञ, हरिद्वार डॉ. अवनीश उपाध्याय बताते हैं कि –“श्रावण में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिससे ज्वर, अतिसार, उदर विकार, त्वचा रोग और जोड़ों के दर्द की आशंका बढ़ जाती है। आयुर्वेद में इस ऋतु को ‘संशोधन चिकित्सा’ जैसे वमन, विरेचन व बस्ती के लिए उपयुक्त माना गया है, ताकि दूषित दोषों का निष्कासन किया जा सके।”

‎डॉ उपाध्याय आगे बताते हैं कि श्रावण मास में दिनचर्या और जीवनशैली बहुत जरूरी है, सुबह जल्दी उठें और हल्के गर्म जल से स्नान करें, अभ्यंग (तैल मालिश) को दिनचर्या में शामिल करें, जिससे वात दोष नियंत्रित रहे, शुद्ध व ताजे जल का सेवन करें, जल को उबालकर पीना हितकर माना गया है।

‎श्रावण मास का खानपान: क्या खाएं, क्या न खाएं?

‎भारी, तैलीय और बासी भोजन से परहेज करें।
‎अरिष्ट, मद्य, आइसक्रीम, ठंडा दूध या अत्यधिक दही इस ऋतु में वर्जित बताया गया है।
‎हरी सब्जियाँ, पुराने धान का चावल, मूंग की दाल, लौकी, तोरी, परवल आदि सुपाच्य आहार हैं।
‎उपवास के समय फल, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और लघु आहार लें।

‎भक्ति और संयम का महीना
‎श्रावण मास केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन को भी शुद्ध करने का काल है। शिव भक्ति, उपवास और संयम आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी शरीर को दोषमुक्त करते हैं। “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” – मन यदि संयमित हो, तो रोगों से मुक्ति संभव है।

‎श्रावण मास को केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय न मानकर, एक स्वास्थ्य जागरूकता मास के रूप में अपनाया जाए तो यह शरीर और मन दोनों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है। आयुर्वेद के शाश्वत सिद्धांतों के अनुसार, प्रकृति के अनुरूप चलना ही उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है।

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