आयुर्वेद हमारी परंपरा और हमारे ऋषि-मुनियों का ज्ञान – आचार्य बालकृष्ण

 

 

हरिद्वार, 19 अगस्त: पतंजलि के वैज्ञानिकों ने पुनः सिद्ध कर दिया है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में वर्णित अष्टवर्ग जड़ी-बूटियों के द्वारा प्राप्त अजरता–अमरता का वरदान मात्र मिथ्या नहीं हैं, इसमें सत्यता भी निहित है। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने अष्टवर्ग एवं अन्य प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधि इम्यूनोग्रिट पर किए गए शोध के द्वारा सिद्ध कर दिया है कि इस औषधि के द्वारा असमय आने वाले बुढ़ापे को प्रभावी रूप से धीमा किया जा सकता है।
इस अवसर पर आचार्य बालकृष्ण जी ने कहा कि तनाव, चिंता, प्रदूषण और गलत जीवनशैली हमें असमय बुढ़ापे की ओर ले जा रही है। आजकल 35-40 वर्ष की आयु में चेहरे पर झुर्रियां, माथे पर लकीरे होना आम बात हो गई है। एलोपैथिक चिकित्सा और महंगे-महंगे इंजेक्शन द्वारा लोग इस समस्या का अस्थाई समाधान खोजने में लगे हैं।
परन्तु इस समस्या का हल भी हमारे पौराणिक ग्रंथों में ही निहित है, हमने अष्टवर्ग जड़ी-बूटियों को वर्तमान युग के अनुरूप, वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ इम्युनोग्रिट के रूप में प्रस्तुत किया है। आयुर्वेद के अनुसार अष्टवर्ग जड़ी-बूटियां बलवर्धक, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाली एवं आयु को बढ़ने से रोकने वाली विशेषताओं से निहित हैं।
उन्होंने आगे कहा कि आयुर्वेद की शक्ति को आज पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है। यह हमारी परंपरा और हमारे ऋषि-मुनियों का ज्ञान है। अब वह समय दूर नहीं जब भारत ही नहीं, पूरा विश्व आयुर्वेद को अपनी चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता देगा।
इम्यूनोग्रिट औषधि विदारीकंद, मेदा, शतावरी, ककोली, क्षीरककोली, रिद्धि, वाराहीकंद, बला, सफ़ेद मूसली, शुद्ध कौंच, अश्वगंधा से बनी है जिन्हें हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथों में बुढ़ापे को मंद करने वाला माना गया है।
इस अवसर पर पतंजलि अनुसन्धान संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. अनुराग वार्ष्णेय ने कहा कि यह शोध उन लोगों के लिए एक आशा की किरण है जो बढ़ती आयु और उस कारण त्वचा पर असमय होने वाली झुर्रियों से चिंतित हैं। इम्यूनोग्रिट मात्र एक हर्बल सप्लीमेंट नहीं, अपितु एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित आयुर्वेदिक समाधान है, जो आने वाले वर्षों में एंटी-एजिंग उपचार की दिशा में बड़ी भूमिका निभाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि हमारा यह प्रयास पुष्टि करता है कि जब परंपरा और विज्ञान साथ आते हैं, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
इस अध्ययन में पाया गया कि इम्यूनोग्रिट बुढ़ापे के कारण त्वचा की कोशिकाओं में होने वाले बदलावों को नियंत्रित करने में कारगर है। साथ ही, इम्यूनोग्रिट ने D-Galactose के कारण त्वचा कोशिकाओं में उत्पन्न Cellular Senescence और Oxidative Stress के प्रभाव को कम किया। इम्यूनोग्रिट ने बुढ़ापे की पहचान माने जाने वाले p16, p21, p53 और β-galactosidase बायोमार्कर को भी संतुलित किया, जिससे त्वचा में लचीलापन बना रहा।
इम्यूनोग्रिट ने त्वचा में विद्यमान कोलेजन को टूटने से बचाया और उम्र बढ़ने से जुड़े MMP1 और MMP9 एंजाइम के स्तर को नियंत्रित किया।
यह शोध जिसमें वृद्धावस्था को भी धीमा करने की शक्ति से निहित इम्यूनोग्रिट औषधि के बारे में बताया गया है, अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल Archives of Gerontology and Geriatrics में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध के बारे में विस्तृत रूप से जानने और हमारी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों में छुपे अजरता–अमरता के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के बारे में पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें:
https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0167494325002316?dgcid=author

Related Posts

देश में पहली बार पतंजलि ने जनजातीय समुदाय को जियो टैगिंग से किया मैपिंग, यह बड़ा कठिन और अनूठा कार्य रहा

हरिद्वार: उत्तराखंड में अब तक 1300 औषधीय पौधों का रिकार्ड मिलता है। लेकिन अकेले पतंजलि ने जनजातीय क्षेत्रों के महज पांच जिलों में अध्ययन करके 1011 पौधों को खोज निकाला…

जनपद में डेंगू से किसी भी व्यक्ति की मृत्यु न हो, सभी व्यवस्थाएं रहें सुदृढ़ – जिलाधिकारी

  *हरिद्वार 16 मई 2026* राष्ट्रीय डेंगू दिवस के अवसर पर डेंगू के नियंत्रण एवं रोकथाम के लिए जिला कार्यालय सभागार में जिलाधिकारी मयूर दीक्षित की अध्यक्षता में संबंधित विभागों…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *