योग और आयुर्वेद से मधुमेह नियंत्रण पर लगी विज्ञान की भी मुहर, समग्र उपचार की ओर बढ़ते वैश्विक कदम

हरिद्वार, 21 अप्रैल 2026: डायबिटीज़ के इलाज को लेकर पतंजलि के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए शोध ने एक क्रांति को जन्म दिया है। जो वैश्विक स्तर पर लंबे समय से टाइप-1 डायबिटीज़ के मुख्य उपचार इंसुलिन थेरेपी को लेकर नजरिया बदलने को मजबूर कर देगा। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान फ्रंटियर्स इन क्लिनिकल डायबिटीज़ एंड हेल्थकेयर शोध ने यह प्रमाणित किया है कि केवल इंसुलिन से नहीं बल्कि समग्र इलाज से ही मधुमेह को मात दी जा सकती है। जिसके लिए योग, प्राणायाम, ध्यान, संतुलित आहार, जीवनशैली में सुधार तथा पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाना होगा। इसी अप्रैल माह में शोध को प्रकाशित किया गया है। शोध में यह भी साबित किया है कि योग-प्रणायाम आदि को अपनाने से मरीजों के शुगर नियंत्रण, तनाव स्तर और जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया।
शोध अध्ययन में लगभग 612 शोध पत्रों का विश्लेषण किया गया। इस शोध को पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने लीड किया है। इस शोध ने यह भी प्रमाणित किया है कि पतंजलि वेलनेस का वह मॉडल है, जिससे करोड़ों मरीज़ पहले से लाभ उठा रहे हैं और अब विज्ञान भी इसे सार्थक बता रहा है।

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क्या है टीवनडीएम, शोध में चौंकाने वाले ये तथ्य
टाइप 1 डायबिटीज मेलिटस (टीवनडीएम) जिसे पहले जुवेनाइल डायबिटीज कहा जाता था, एक दीर्घकालिक जीवनशैली संबंधी रोग है। इसमें अग्न्याशय (पैंक्रियाज़) की इंसुलिन बनाने वाली β-कोशिकाओं का नाश हो जाता है, जिससे शरीर में इंसुलिन की पूर्ण कमी हो जाती है और रक्त शर्करा (ब्लड ग्लूकोज) का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। कुछ मामलों में अग्न्याशय से संबंधित ऑटोएंटीबॉडी कम मात्रा में पाए जाते हैं, इसलिए इसे इडियोपैथिक (T1b) डायबिटीज भी कहा जाता है। विश्व में हर पाँच में से एक बच्चा, जिसे टीवनडीएम होता है, भारतीय मूल का होता है। यह रोग आमतौर पर बचपन या किशोरावस्था में शुरू होता है, लेकिन वयस्कों में भी हो सकता है, जहाँ इसके लक्षण धीरे-धीरे और हल्के होते हैं। हर साल लगभग 65,000 बच्चों में इसका निदान होता है और इसकी दर हर साल लगभग 3% बढ़ रही है।
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शोध को चार मुख्य विषयों में बांटकर किया गया
शोध को मजबूत मानकों पर जांचा गया। शोध का निष्कर्ष निकालने से पहले उसे चार मानकों पर कसा गया। इसमें क्लिनिकल उपचार, योग और वैकल्पिक चिकित्सा, आयुर्वेद और भारत केन्द्रित दृष्टिकोण और व्यायाम और ग्लूकोज नियंत्रण।
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रिसर्च में इनका विशेष योगदान
इस शोध में पतंजलि हर्बल रिसर्च डिवीजन, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार, उत्तराखंड, डिपार्टमेंट ऑफ एलाइड एंड एप्लाइड साइंसेज़, यूनिवर्सिटी ऑफ पतंजलि, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार के वैज्ञानिक जया उप्रेती, मुस्कान चौहान, मयूर चौहान, प्रशांत कटियार, अनुराग डाबस और वेद प्रिया आर्य का विशेष योगदान रहा। इस शोध को पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण के नेतृत्व में किया गया। उनकी भूमिका इसमें सबसे अहम रही।
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कोट-
टाइप वन मधुमेह पर आई नई रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि योग, आयुर्वेद और नेचरोपैथी जैसी इंट्रीग्रेटेड थरेपी मरीजों के लिए बेहद मददगार है। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने इस ओर बड़ा पुरुषार्थ किया है। इतना ही नहीं एकीकृत इलाज से स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर दिखा है। अब दुनिया भर में इस विषय पर शोध तेजी से बढ़ रही है और भारत ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। पतंजलि योग, आयुर्वेद और नेचरोपैथी के जरिये मधुमेह सहित कई जटिल और असाध्य रोगों को लगातार अपने वैज्ञानिक और साक्ष्य आधारित प्रमाणों के साथ शोध कर रहा है। यहां यह गौर करने वाली बात है कि पतंजलि वेलनेस का वह मॉडल है जिससे करोड़ों मरीज़ पहले से लाभ उठा रहे हैं और अब विज्ञान भी इसे सही साबित कर रहा है। यह कोई वैकल्पिक इलाज नहीं है। यह आधुनिक और समग्र स्वास्थ्य सेवा की नई दिशा है। डायबिटीज़ का असली इलाज एकीकृत है और अब इस शोध के साथ इसके सबूत भी मौजूद हैं।

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