देहरादून/चमोली: चमोली की दुर्गम पहाड़ियों से निकलकर चेन्नई की ‘ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी’ तक का सफर केवल एक करियर की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक बेटे द्वारा अपने स्वर्गीय पिता को दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। थराली के ग्राम रतगाँव निवासी राहुल फरस्वाण अब भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन चुके हैं।
1. रिक्त स्थान और अधूरा सपना
राहुल के लिए यह गौरवशाली क्षण जितना हर्ष का है, उतना ही भावुक भी। उनके पिता, स्वर्गीय श्री महिपाल सिंह फरस्वाण, जिनका सपना राहुल को वर्दी में देखना था, आज शारीरिक रूप से उनके साथ नहीं थे।
* एक अपूरणीय क्षति: मात्र 6 महीने पहले राहुल ने अपने पिता को खो दिया। महिपाल सिंह जी न केवल एक पूर्व प्रधान थे, बल्कि क्षेत्र के एक ऐसे समाजसेवी थे जिन्होंने अपना जीवन दूसरों के हित में समर्पित किया।
* पिता का अदृश्य हाथ: पासिंग आउट परेड के दौरान जब राहुल के कंधों पर सितारे सजाए जा रहे थे, तब उनकी आँखों की नमी और चेहरे का गर्व यह चीख-चीख कर कह रहा था कि उनके पिता कहीं न कहीं ऊपर से मुस्कुराते हुए उन्हें देख रहे हैं।
2. संघर्ष की नींव: माँ का तप
पिता के जाने के बाद, परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा, लेकिन राहुल की माता ने हिम्मत नहीं हारी।
* खेतों से अकादमी तक: माँ ने एक ओर खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी संभाली और दूसरी ओर यह सुनिश्चित किया कि राहुल का ध्यान अपने लक्ष्य से न भटके।
* भाई-बहन का संबल: बड़े भाई (शिक्षक) और बहन (होटल इंडस्ट्री) ने राहुल के लिए एक सुरक्षा कवच का काम किया, ताकि वह केवल अपनी मेहनत पर ध्यान केंद्रित कर सके।
3. शिक्षा और असफलताओं से परिचय
राहुल की सफलता रातों-रात नहीं मिली। यह सालों की तपस्या का परिणाम है:
* शैक्षणिक सफर: श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल से प्रारंभिक और डी.ए.वी. पीजी कॉलेज, देहरादून से उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए राहुल ने खुद को हर चुनौती के लिए तैयार किया।
* हार को दी मात: राहुल के अनुसार, कई बार असफलता हाथ लगी, आत्मविश्वास डगमगाया, लेकिन पिता के शब्द—”हारना नहीं है”—हमेशा उनके कानों में गूंजते रहे।
4. क्षेत्र के लिए गौरव और युवाओं के लिए संदेश
आज रतगाँव का हर कोना राहुल की जय-जयकार कर रहा है। राहुल ने साबित कर दिया है कि:
* सुविधाएं नहीं, संकल्प मायने रखता है: एक छोटे से गांव और मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर भारतीय सेना के अधिकारी वर्ग में शामिल होना यह बताता है कि अभावों में भी प्रभाव पैदा किया जा सकता है।
* विरासत का मान: राहुल ने अपने पिता की समाज सेवा की विरासत को अब राष्ट्र सेवा के बड़े कैनवस पर उकेरने का संकल्प लिया है।
> “पिताजी आज पास नहीं हैं, पर उनके दिए संस्कार और देशप्रेम की लौ मेरे सीने में हमेशा जलती रहेगी। यह वर्दी और ये सितारे उन्हीं के संघर्षों का प्रतिफल हैं।” — लेफ्टिनेंट राहुल फरस्वाण
